शनिवार, 10 दिसंबर 2016

नोट बंदी के बाद राजनीतिक माहौल

राजनीति
मोदी सरकार द्वारा नोटबंदी के फैसले बाद से देश में उपजे राजनीतिक माहौल से लेकर बैंको की लाईनो में लगे लोगों के तर्क आपेक्षाओं की बात करें तो वर्ष 2019 में होने वाले आम चुनाव के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में अब तक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ही देखा जा रहा था। लेकिन, मौजूदा समय के नोटबंदी के बाद से देश की राजनीतिक फिजा कुछ हद तक बदली हुई नजर आने लगी है। मौजूदा समय में अचानक नीतीश कुमार द्वारा मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले का खुलकर समर्थन किया जाना इस बात की ओर संकेत करता है कि अबतक जिन नेताओं के विषय में यह माना जाता रहा कि वे कभी गैर भाजपाई और गैर कांग्रेसी दलों की अगुवाई करते दिखाई देते थे, मौजूदा समय में उनका हाल भी बदलता हुआ दिखाई देने लगा है। जिसमें से एक समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव हैं। लेकिन एक बात अवश्य है कि जिस तरह से वे आज से एक महिने पहले तक जिस तरह से अपने पारिवारिक कलह में उलझे दिखई दे रहे थे, उससे उनके लिए आगे की राजनीतिक राह बहुत मुश्किल होती दिखई दे रही थी, दूसरी तरफ तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता अस्पताल में अपनी खराब सेहत से जूझ रही हैं और जो लोगों उन्हें एक विकल्प के तौर पर देखे रहे थे, ऐसे लोग अब उनके बारे में बहुत पक्के तौर पर आश्वस्त नहीं हैं।
यदि हम इस दृष्टी कोण से देखें तो राष्ट्रीय राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के ममता बनर्जी के राजनीतिक पहलूओं के उत्थान के लिए मौजूदा सियासी परिस्थितियां उनके अनुरूप ही दिखई दे रही हैं। देश में हुए नोटबंदी के मसले पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस तरह से मुखर होकर सामने आई हैं, इसकी बजह से कई लोगों को अप्रत्याशित लगने लगा है इस बात से यह मतलब निकाला जाने लगा है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस में एक सही नेतृत्व के अभाव में सरकार को नीतीश कुमार के समर्थन के अलावा दूसरे अन्य क्षेत्रीय दलों के नेताओं की परेशानियों की वजह से जो जगह शुन्य हुई थी, मौजूदा समय में उसे ममता बनर्जी भरने की कोशिश करती हुई दिखाई दे रही हैं हालांकि इस जगह के खाली पन को वे कितनी पुख्ता तरिके से भर पाती हैं या नही यह अभी निश्चित तौर पर कहा नहीं जा सकता है।
राजनीतिक हलकों के लोगों द्वारा ममता बनर्जी के चिटफंड घोटालों में फंसे होने के वाबजूद पश्चिम बंगाल में बड़ी जीत हासिल करने के बाद से ममता बनर्जी की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा निश्चित तौर पर और भी ज्यादा मजबूत हुई है इसके साथ ही साथ वे विपक्षी दलों के बीच की दूरियों को भी पाटने की लगातार कोशिश कर रहीं हैं देश में हुए नोटबंदी फैसले के खिलाफ सभी विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश में उन्होंने अभी तक एक-एक कर लगभग सभी पार्टीयों के नेताओं को अपने विश्वास में लेने की कोशिश के मद्देनजर उन्होनें नोटबंदी के खिलाफ जनता और विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश में कितनी कामयाब हो पाऐगीं यह तो आने वाले वक्त ही बताएगा। हालांकि नोटबंदी के विरोध पर कटाक्ष करने वाली मोदी सरकार द्वारा ममता के ऐलान को गंभीरता से लेने के संकेत सामने आए हैं। कुछ खबरों में तो यह भी दावा किया जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने उनसे मिलने की इच्छा तक जाहिर किया, लेकिन जिसे उन्होंने खारिज कर दिया। इसके अलावा भाजपा ने पूरे पश्चिम बंगाल में 30 नवंबर को उत्थान दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया है। इस दिन वे पार्टी लोगों के बीच यह संदेश पहुंचाने की कोशिश करेगें कि ममता बनर्जी लोकतंत्र को खत्म करने पर अड़ी हुई हैं और नोटबंदी के मामले में वे जनता को गुमराह कर रही हैं। भाजपा ने कार्यकर्ताओं से नोटबंदी पर राज्य के लोगों को एकजुट करने के लिए भी कहा है।
राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत विपक्ष का अभाव स्पष्ट तौर पर दिखई दे रहा है, कई राजनीतिक जानकार तो इसे लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह मानते हैं जैसा कि नोटबंदी के मामले में एक मजबूत विपक्ष की कमी साफ तौर पर सबको अखर रही है। हालांकि इसे मुद्दा बनाकर राष्ट्रीय स्तर पर ममता बनर्जी के उभरने की कोशिश भाजपा सहित नरेंद्र मोदी के लिए भी चिंता का सबब बन सकती है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। केंद्रीय मंत्री के रूप में ममता बनर्जी के पास अलग-अलग मंत्रालयों को संभालने का अनुभव तो है ही इसके अलावा पश्चिम बंगाल में विगत 34 वर्षो से लगातार जमी वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद दूसरी बार मुख्यमंत्री बनना और संघर्षशील नेता की छवि जैसे कारक निश्चित तौर पर उनकी दावेदारी को और भी ज्यादा मजबूत करते हैं। जानकारों के एक वर्ग के मुताबिक उनके पक्ष में जो सबसे बड़ी बात है, वह यह है कि उनके द्वारा तय किए गए मुद्दों और नीतियों के केंद्र में किसान, मजदूर और छोटे कारोबारी जैसे लोगों का रहना और इसी तबके के लोगों पर नोटबंदी का सबसे बुरा असर भी पड़ा है। राष्ट्रीय स्तर पर 34 सांसदों के साथ तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और अन्नाद्रमुक के बाद तीसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। इसके अलावा अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार और गुजरात में हार्दिक पटेल का साथ भी उनकी स्थिति को और मजबूत करता है।
हालांकि ममता बनर्जी में दूसरो की तरह कई खामियां भी हैं जो उनके राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरने की महत्वाकांक्षाओं के मंसूबें में चोट लग सकती हैं। यदि हम अब तक के भारतीय राजनीति के इतिहास में झांकें तो यह स्पष्ट तौर पर दिखाई देने के अलावा समझ में आता है कि काफी हद तक इसकी दशा एवं दिशा अब तक हिंदी पट्टी से ही तय होती चली आ रही है किसी भी राजनेता का देश की जनता को उसकी भाषा में संबोधित न कर पाना उस जनता में प्रभाव एवं उनसे निकटता हासिल करने में एक बड़ी बाधा के रुप में सामने आती है इसी बाधा को दूर करने का समय अब ममता बनर्जी के सामने आने से उन्होनें हिंदी भाषी क्षेत्रों पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए बीड़ा उठा जरूर लिया है। लेकिन इनसब के अलावा उनका उग्र एवं अस्थिर स्वभाव ही उनके नेतृत्व में किसी अन्य तीसरे फ्रंट की संभावनाआओं पर सवालिया निशान लगाता है। उनके इस तरह का स्वभाव विपक्षी पार्टियों को साथ एक मंच पर लाने में दिक्कत खड़ी कर सकती है। एक प्रखर नेता के रूप में राजनीतिक समीकरणों के बीच ममता बनर्जी राष्ट्रीय मंच पर कितनी सफल हो पाती हैं, यह तो आने वाला वक्त ही बता पाएगा लेकिन मौजूदा दौर में नोटबंदी की विफलता और इससे उपजे राजनीतिक माहौल को भुनाने में ममता बनर्जी की क्षमता एवं कुशलता पर ही निर्भर करती है। और आने वाला वक्त ही यह बताने मे सक्षम होगा कि ममता बनर्जी नोटबंदी के विरोध के जरिए देश के राजनीति के धरातल पर किस मुकाम तक पहुंच पाती हैं।

 

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